सुट्टा ब्रेक

 

नोट: लेख में कई जगह पर “इन लोगो” का इस्तेमाल हमारे समाज के उन हीरोज़ के लिए किया गया है जो हमारी रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी को आसान बना देते है। ये लोग जैसे इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर, कारपेंटर, तकनीशियन, मजदूर आदि है।

हम भारतीय लोग बॉलीवुड से भड़े ही इन्फ्लुएंस है। इसी बात पर एक फिल्म का डायलॉग मुझे याद आ गया “ इंसान की सोच ब्रांडेड होनी चाहिए कपड़े नहीं “। डायलॉग तो बड़ी गहरी बात कहता है लेकिन हम अमल कितना करते है। ज़रा एक पल ठहरीये और सोचिये आपके घर पर आने वाले इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर, कारपेंटर, तकनीशियन आदि लोगो को क्या हम उस मान सम्मान के साथ देखते है जिस तरह एक डॉक्टर, मल्टी -नेशनल कंपनी के एक इंजीनियर को देखा जाता है ? कई लोगो के मन ही मन में एक प्रशन की लहर उठ रही होगी की ऐसा क्यों ? यह हिन भावना कहाँ से आई ? इस का उत्तर है हमारे माता-पिता क्यों की मुझे लगता है की हम हमारा व्यवाहरिक ज्ञान हमारे घर से ही सीखते है। हां ये बात और है की उम्र दराज़ उस ज्ञान में मामूली सा ही फरक होता है लेकिन फाउंडेशन तो घर के लोगो के बीच ही बनती है। मुझे इस बात का बड़ा मग़रूर है की ये ज्ञान बड़े ही सहजता से मुझे मेरे माता पिता से विरासत के तोर पर मिला है। जैसे की इंसान कोई भी हो उसका मान सम्मान करो। काफी बार तो लोग इन लोगो का करैक्टर भी जज करते नहीं कतराते। उद्धरण के तोर पर अगर आप के घर में कभी इन लोगो का काम पड़ा हो तो अपने अक्सर मम्मी को कहते सुना होगा इन लोगो से दूर रहना, ये लोग हम लोगो की बराबरी नहीं कर सकते आदि कह कर हमारे घर वाले वो भेद भाव का ज़हर कब हमारे मन में घोल देते है और हमें पता भी नहीं चलता।

एक किस्सा है जिसे जब भी याद करता हूँ तब तब इन लोगो के लिए सम्मान और बड़ जाता है। हमारे घर पर इलेक्ट्रीशियन का काम चल रहा था। मैं और मम्मी उन से काम करवा रहे थे। काफी देर हो गयी थी और वो न जाने क्यों स्ट्रेस से लग रहे थे और वो मौके की तलाश में कब मम्मी उनके सर से जाये और वो एक स्मोक ब्रेक ले। उन्होंने मुझे इशारा किया और मैं समझ गया। मैंने जैसे ही मम्मी को गोरुंद फ्लोर पर भेजा और मैंने इशारा कर दिया। वह अपना सुट्टा एन्जॉय कर रहे थे तभी मैंने उनसे पूछा भैया अपने मम्मी के सामने क्यों नहीं पूछा जब की आज कल तो यह बड़ा ही कॉमन है ? वो शांत रहे, सुट्टा ख़ात्म किया और मुस्कराकर बोले “भैया जी कॉमन तो बहुत कुछ होवे है, लेकिन नारी मान-सम्मान भी तो कोई चीज़ होवे है”। और वो अपने काम में फिर से लग गए।

— उज्जवल बंसल

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